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मंजूषा कला : भागलपुर की आस्था और लोककला की अनमोल धरोहर

मंजूषा कला : भागलपुर की आस्था और लोककला की अनमोल धरोहर

बिहार का हर कोना अपनी विशिष्ट कला और परंपरा के लिए जाना जाता है। भागलपुर (चंपानगर) की धरती पर जन्मी मंजूषा कला ऐसी ही एक अद्वितीय लोककला है, जो धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाओं और लोककथाओं से गहराई से जुड़ी हुई है।

मंजूषा क्या है?

  • ‘मंजूषा’ शब्द का अर्थ है सुंदर सजाया हुआ बॉक्स या टोकरी। यह विशेष रूप से मनसा पूजा (नागदेवी मनसा की आराधना) में प्रयुक्त होती है।
  • यह संरचना चौकोर होती है, जिसे कागज, थर्माकोल की शीट और बाँस की कड़ियों से बनाया जाता है।
  • ऊपर इसका आकार चार-बंगला घर की तरह पिरामिडनुमा होता है।
  • मंजूषा की दीवारों पर रंगीन चित्र उकेरे जाते हैं, जो मुख्यतः बिहुला-लखन की लोककथा पर आधारित होते हैं।

बिहुला-लखन की कथा और मंजूषा कला

मंजूषा कला का सीधा संबंध विशहरी पूजा से है। इसमें विशहरी गीत/गाथा गाए जाते हैं, जिनमें बिहुला और उनके पति लखन का दुखांत प्रसंग वर्णित होता है।

कथा के अनुसार –

  • बिहुला के पति लखन की मृत्यु सांप के काटने से हो जाती है।
  • लेकिन अटूट विश्वास और साहस के बल पर बिहुला अपने पति को फिर से जीवित कराती है।
  • इसी कथा को मंजूषा कला की चित्रात्मक शैली में उकेरा जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ

मंजूषा कला को इसकी रेखाओं और साहसिक रंगों के कारण पहचाना जाता है।
इसमें खासतौर पर निम्न चित्रांकन मिलते हैं –

  • बिहुला – पति लखन को गोद में लिए हुए
  • साँप – जल पर तैरते हुए, तीन मुख वाले या पाँच सिर वाले नाग
  • सूर्य और चंद्रमा – समय और शाश्वत शक्ति का प्रतीक
  • पेड़-पौधे, हाथी और मछलियाँ – प्रकृति और जीवन का चित्रण

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • चंपानगर, जो प्राचीन काल में अंग महाजनपद की राजधानी था, का उल्लेख महाभारत और पुराणों में मिलता है।
  • यहाँ से मंजूषा कला का उद्भव हुआ और धीरे-धीरे यह भागलपुर की लोक पहचान बन गई।
  • पहले मंजूषा की दीवारों पर खनिजों से बने प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाए जाते थे।
  • समय के साथ इसमें व्यावसायिक रंगों और आधुनिक शैलियों का प्रयोग होने लगा।

आधुनिक दौर में मंजूषा

  • आज मंजूषा कला केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि
  • पेंटिंग्स, वॉल हैंगिंग्स, होम डेकोर और स्टेशनरी तक इसका विस्तार हो चुका है।
  • यह कला न सिर्फ लोक परंपरा को जीवित रखती है, बल्कि ग्रामीण कलाकारों के लिए आजीविका का साधन भी बन रही है।
  • मंजूषा कला को बिहार की अन्य लोककलाओं जैसे मधुबनी और पिपरई कला की तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

निष्कर्ष

मंजूषा कला केवल एक चित्रकला नहीं, बल्कि भागलपुर की सांस्कृतिक स्मृति, आस्था और लोककथा का अद्भुत संगम है। यह कला बिहुला जैसी नारी की साहस, श्रद्धा और संघर्षशीलता को अमर करती है और हमें याद दिलाती है कि लोककला ही हमारी जड़ों से जोड़ने वाली सबसे सशक्त कड़ी है।
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by Ranjana Jha (Author), Sylvan Jha (Author)

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