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टिकुली कला: बिहार की पारंपरिक शिल्पकला की चमक

टिकुली कला: बिहार की पारंपरिक शिल्पकला की चमक

बिहार अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कला परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इसी विरासत का एक अनमोल रत्न है टिकुली कला, जिसका नाम स्थानीय शब्द ‘टिकुली’ से लिया गया है। टिकुली, जिसे आमतौर पर महिलाएँ अपनी भौंहों के बीच पहनती हैं, पारंपरिक रूप से बुद्धि और शालीनता का प्रतीक माना जाता था।

लेकिन समय के साथ यह कला महिलाओं के सशक्तिकरण और व्यवसायिक पहचान का माध्यम बन गई, खासकर पटना के दानापुर क्षेत्र में।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रारंभ में टिकुली पिघले हुए कांच (molten glass) से बनाई जाती थी, जिसे प्राकृतिक रंगों और सुनहरे पन्ने (gold foil) से सजाया जाता था। यह एक शाही और भव्य आभूषण माना जाता था और मुगल दरबारों में इसकी खूब सराहना होती थी।

  • टिकुलियों की मूल्य निर्धारण उनकी सजावट और विवरण की जटिलता पर निर्भर करती थी।
  • व्यापारी उत्तर और पश्चिम भारत से पटना आते और इन उत्कृष्ट टिकुलियों को खरीदते।

हालांकि, औपनिवेशिक काल के बाद यह कला लगभग विलुप्त हो गई और 1900 के आसपास टिकुली कला लगभग समाप्त हो चुकी थी।

पुनरुद्धार और नवाचार

1954 में पद्मश्री उपेन्द्र महाराठी ने जापानी हार्डबोर्ड पेंटिंग से प्रेरणा लेकर टिकुली कला को नए स्वरूप में पेश किया। उन्होंने ग्लेज़्ड हार्डबोर्ड पर टिकुली के चित्र बनाने का तरीका विकसित किया।

1974 से चित्रकार और शिल्पकार अशोक के. बिस्वास और उनकी पत्नी उद्यमी शिबानी बिस्वास ने इस कला को पुनर्जीवित किया और इसे व्यावसायिक पहचान दिलाई।

निर्माण की प्रक्रिया

टिकुली कला की प्रक्रिया अत्यंत सावधानी और कौशल की मांग करती है:

लकड़ी का आधार तैयार करना: कलाकार लकड़ी की सतह को बार-बार सैंडपेपर से घिसकर चमकदार और गहरे रंग का आधार बनाते हैं, जो पॉलिश्ड ग्रेनाइट जैसा दिखता है।

रंग और चित्रण:

  • कलाकार एनामेल पेंट्स का उपयोग करते हैं।
  • साबल या स्क्विरल हेयर के छोटे ब्रश से बारीक डिज़ाइन बनाते हैं।
  • रंग संयोजन प्रायः प्राथमिक रंगों (primary colours) में होता है।

विस्तार और नवाचार:

  • समय के साथ थीम, रचनाएँ और रंग योजना विकसित हुई।
  • टिकुली अब केवल सजावटी कला नहीं, बल्कि कोस्टर, ट्रे, मोबाइल स्टैंड जैसे उपयोगी वस्त्रों में भी उभर रही है।

सामाजिक और आर्थिक महत्व

  • महिला सशक्तिकरण: दानापुर और आसपास के क्षेत्रों की महिलाएँ टिकुली कला से आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करती हैं।
  • व्यावसायिक अवसर: टिकुली कला अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी लोकप्रिय हो रही है।
  • परंपरा और नवाचार का संगम: यह कला पारंपरिक शिल्प को आधुनिक व्यावसायिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालती है।

टिकुली कला की विशेषताएँ

  • सूक्ष्म और जटिल डिज़ाइन
  • सुनहरे पन्ने और प्राकृतिक रंगों का मिश्रण
  • व्यावहारिक और सजावटी दोनों उपयोगों के लिए उपयुक्त
  • GI टैग और सांस्कृतिक मान्यता की संभावना

निष्कर्ष

टिकुली कला केवल बिहार की सांस्कृतिक विरासत नहीं है, बल्कि यह स्थानीय कलाकारों की मेहनत, सृजनात्मकता और उद्यमिता का प्रतीक भी है।

आज, टिकुली कला सजावट, उपयोगिता और व्यवसायिक संभावनाओं के माध्यम से बिहार की कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रही है। यह कला हमें याद दिलाती है कि परंपरा और नवाचार का संगम कितना सुंदर और टिकाऊ हो सकता है।

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by Ranjana Jha (Author), Sylvan Jha (Author)

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