बिहार की धरती कला और शिल्प परंपराओं के लिए जानी जाती है। यहाँ की मधुबनी पेंटिंग, सिक्की शिल्प, टिकुली कला जैसी कारीगरी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इन्हीं अद्भुत कलाओं में से एक है पेपर मैशे (Paper Mache), जिसे हिंदी में कागज़ लुगदी शिल्प भी कहा जाता है।
“पेपर मैशे” शब्द फ्रेंच भाषा से आया है, जिसका अर्थ है – “चबाया हुआ कागज़”। यह एक पारंपरिक शिल्प है जिसमें कागज़ की लुगदी को गोंद या किसी अन्य चिपचिपे पदार्थ के साथ मिलाकर विभिन्न कलात्मक और उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
बिहार में पेपर मैशे का इतिहास
बिहार में यह कला विशेष रूप से मधुबनी ज़िले के सलेमपुर गाँव में पाई जाती है। यहाँ की महिलाएँ खेती-किसानी के साथ-साथ पेपर मैशे शिल्प को भी जीवित रखे हुए हैं।
सलेमपुर में बनने वाले पेपर मैशे शिल्प न केवल सजावटी वस्तुएँ होते हैं, बल्कि इनमें गहरी सांस्कृतिक पहचान भी झलकती है।
- दीये (Diyas) – त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर जलाए जाने वाले।
- हाथी (Haathi) – शक्ति और समृद्धि का प्रतीक।
- कोहबर (Kohbar) – विवाह में शुभता का प्रतीक, झोपड़ी के आकार की संरचना।
कोहबर का महत्व खास है। बिहार की शादी परंपरा में वर-वधू की रस्में पूरी होने के बाद दूल्हा कोहबर पर सिंदूर चढ़ाता है, जिससे नवदंपत्ति के जीवन में मंगल की शुरुआत होती है।
निर्माण प्रक्रिया
पेपर मैशे वस्तुओं को बनाने की प्रक्रिया समय लेने वाली लेकिन बेहद रोचक होती है –
- लुगदी तैयार करना – पुराने कागज़ को पानी में भिगोकर उसका गाढ़ा पल्प (लुगदी) बनाया जाता है।
- गोंद के साथ मिलाना – लुगदी को चिपकाने के लिए उसमें गोंद या प्राकृतिक चिपकने वाला पदार्थ मिलाया जाता है।
- आकार देना – इसे मनचाहे आकार में ढालकर किसी साँचे पर जमाया जाता है।
- मुल्तानी मिट्टी की परत – वस्तु पर मुल्तानी मिट्टी (Fuller’s Earth) की लेप चढ़ाई जाती है ताकि मजबूती और चिकनाई बनी रहे।
- सुखाना और घिसाई – सूखने के बाद इसे सैंडपेपर से घिसकर सतह को एकदम चिकना बनाया जाता है।
- चित्रकारी – अंत में उस पर मधुबनी पेंटिंग की तरह रंग-बिरंगे पारंपरिक डिज़ाइन बनाए जाते हैं।
सलेमपुर और शुभद्रा देवी का योगदान
- सलेमपुर गाँव की इस कला को पहचान दिलाने का श्रेय जाता है शुभद्रा देवी को।
- उन्होंने इस कला को न सिर्फ़ सहेजा बल्कि इसमें मधुबनी पेंटिंग के पारंपरिक रूपांकनों को भी शामिल किया।
- 1980 में राज्य पुरस्कार (बिहार) और 1992 में राष्ट्रीय पुरस्कार पाकर उन्होंने इस शिल्प को देशभर में पहचान दिलाई।
- बीते 20 वर्षों में उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी की महिलाओं को प्रशिक्षित किया।
- उनके प्रयासों से आज सलेमपुर की महिलाएँ इस कला के माध्यम से आत्मनिर्भर हो रही हैं।
सामाजिक और आर्थिक महत्व
- यह शिल्प गाँव की महिलाओं को रोज़गार उपलब्ध कराता है।
- परंपरागत संस्कृति और मिथिला कला को संरक्षित करता है।
- आधुनिक समय में पेपर मैशे वस्तुएँ होम डेकोर, गिफ्ट आइटम और सांस्कृतिक प्रदर्शनियों में लोकप्रिय हैं।
निष्कर्ष
पेपर मैशे केवल कागज़ की लुगदी से बनी वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक धरोहर और महिलाओं की रचनात्मकता का प्रतीक हैं।
सलेमपुर की यह कला हमें यह सिखाती है कि सीमित संसाधनों से भी अनूठी और विश्वस्तरीय कला का निर्माण संभव है। शुभद्रा देवी जैसी कलाकारों ने इस शिल्प को नई पहचान दिलाई है और आज यह कला बिहार की अस्मिता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है।









