बर्लिन की उसी लैब में एक युवा वैज्ञानिक ने कदम रखा था।
उसका नाम था…
जैक।
उस समय उसकी आँखों में थकान नहीं थी।
न निराशा…
न डर…
बल्कि एक जुनून था।
कुछ असंभव कर दिखाने का जुनून।
जैक को यह नौकरी एक शोध-पत्र की वजह से मिली थी।
उसने अपनी थीसिस के दौरान क्वांटम एंटैंगलमेंट पर एक बेहद दिलचस्प पेपर लिखा था।
पेपर को पढ़कर लैब के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक की नज़र उस पर पड़ी।
बाकी लोग उसके विचारों को लेकर संशय में थे।
लेकिन एक व्यक्ति को जैक में कुछ अलग दिखाई दिया।
वह था…
डॉ. क्रूगर।
उन्होंने जैक को इंटरव्यू के लिए बुलाया।
जैक उस कमरे में पहुँचा तो उसके सामने एक बेहद गंभीर वैज्ञानिक बैठा था।
डॉ. क्रूगर ने कुछ देर तक उसकी फाइल देखी।
फिर धीरे से सिर उठाया।
और पूछा…
“क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हें यह विचार कहाँ से मिला, नौजवान?”
जैक कुछ पल चुप रहा।
यह सवाल आसान नहीं था।
क्योंकि उसके असली विचार की शुरुआत किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में नहीं हुई थी।
उसकी शुरुआत…
एक फिल्म से हुई थी।
जैक ने धीरे से कहा…
“सर… मुझे हमेशा से साइंस फिक्शन में दिलचस्पी रही है।”
डॉ. क्रूगर चुपचाप उसे देखते रहे।
जैक ने आगे कहा…
“फिल्में हों या किताबें… उनमें दिखाई जाने वाली कल्पना मुझे हमेशा आकर्षित करती रही है।”
“लेकिन सिर्फ़ कल्पना नहीं।”
“मुझे उनमें दिखाई जाने वाली तकनीक और विज्ञान भी आकर्षित करता था।”
जैक के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उसे अपना बचपन याद आ गया।
“मुझे बचपन में Star Trek देखना बहुत पसंद था।”
“जिस दिन मैंने पहली बार उसे देखा… मैं पूरी तरह मंत्रमुग्ध हो गया था।”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला…
“सच कहूँ तो… वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा मुझे वहीं से मिली।”
डॉ. क्रूगर ने अपनी कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकते हुए पूछा...
“लेकिन तुमने अभी तक यह नहीं बताया कि तुम्हें यह खास विचार कहाँ से मिला।”
“तुम्हारी थीसिस में भी इसके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं है।”
जैक समझ गया…
अब असली सवाल शुरू हो चुका था।
उसने गहरी साँस ली।
“सर… विचार उसी फिल्म से आया।”
डॉ. क्रूगर की भौंहें हल्की सी उठीं।
जैक ने कहा…
“फिल्म में एक मशीन होती है।”
“उसे कहते हैं... ट्रांसपोर्टर।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
“यह मशीन इंसान को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचा देती है।”
“बस कुछ सेकंड में।”
डॉ. क्रूगर ने जैक को ध्यान से देखा।
जैक की आवाज़ में अब उत्साह था।
“मैंने सोचा… अगर फिल्म में यह कल्पना की जा सकती है… तो क्या विज्ञान इसे हकीकत में बदल सकता है?”
डॉ. क्रूगर ने तुरंत सवाल किया…
“और तुम्हारे पास इसका वैज्ञानिक आधार क्या है?”
यही वह सवाल था जिसका जैक इंतज़ार कर रहा था।
“क्वांटम फिजिक्स।”
जैक ने जवाब दिया।
“विशेष रूप से… क्वांटम टेलीपोर्टेशन।”
डॉ. क्रूगर अब पहले से अधिक गंभीर हो गए।
जैक आगे बोलता गया…
“मैंने क्वांटम एंटैंगलमेंट के बारे में पढ़ना शुरू किया।”
“फिर मुझे एहसास हुआ कि दो कणों के बीच एक ऐसा संबंध बनाया जा सकता है… जिसे सामान्य विज्ञान की भाषा में समझना आसान नहीं है।”
“और अगर हम इस सिद्धांत को सही तरीके से इस्तेमाल कर सकें...”
जैक कुछ पल के लिए रुका।
“तो शायद किसी क्वांटम अवस्था को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जा सकता है।”
डॉ. क्रूगर ने तुरंत टोका…
“शायद?”
जैक चुप हो गया।
डॉ. क्रूगर ने कहा…
“तुम्हारे पास कोई प्रमाण नहीं है।”
“कोई वास्तविक प्रयोग नहीं।”
“सिर्फ़ सिद्धांत।”
फिर उन्होंने मेज़ पर रखी जैक की थीसिस की ओर इशारा किया।
“तुम संख्याओं को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी कहला सकते हो।”
“लेकिन प्रायोगिक विज्ञान ऐसा नहीं करता।”
“तुम्हें इसे वास्तविक दुनिया में साबित करना होगा।”
जैक को उम्मीद नहीं थी कि इंटरव्यू इतना कठिन होगा।
उसे लगा था कि उसकी डिग्री…
उसके शानदार अंक…
और उसकी थीसिस…
सब कुछ उसे आसानी से नौकरी दिला देगा।
लेकिन डॉ. क्रूगर उससे प्रभावित होने के बजाय…
उसे चुनौती दे रहे थे।
जैक ने खुद को संभाला।
“सर, मैं मानता हूँ कि अभी यह एक परिकल्पना है।”
“लेकिन अगर मेरे पास सही उपकरण होते… तो मैं प्रयोग कर सकता था।”
डॉ. क्रूगर ने पूछा…
“तुमने विश्वविद्यालय में कोशिश नहीं की?”
जैक ने सिर हिलाया।
“विश्वविद्यालय के पास आवश्यक तकनीक नहीं थी।”
“और वे इस पर पैसा खर्च करने को भी तैयार नहीं थे।”
फिर उसने डॉ. क्रूगर की ओर देखा।
“लेकिन आपकी लैब अलग है।”
“आपके पास ऐसी तकनीक है जो बाकी जगहों पर आसानी से उपलब्ध नहीं है।”
“आपकी लैब उन चीज़ों पर काम करती है… जिन्हें दूसरे लोग असंभव मानते हैं।”
जैक की आवाज़ में पूरा विश्वास था।
“अगर मुझे यहाँ काम करने का मौका मिला… तो मैं इसे साबित कर सकता हूँ।”
डॉ. क्रूगर ने कुछ नहीं कहा।
बस उसे देखते रहे।
फिर बोले…
“यह कोई फिल्म नहीं है, जैक।”
“यहाँ तुम अपनी कल्पना के हिसाब से नियम नहीं बदल सकते।”
“अगर तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें नौकरी दूँ…”
“तो मुझे विश्वास दिलाओ कि तुम्हारा सपना सिर्फ़ सपना नहीं है।”
जैक के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी।
उसने अपने नोट्स की ओर देखा।
फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।
“सर… फिल्म में ट्रांसपोर्टर क्या करता है, मैं आपको उसी तरीके से समझाता हूँ।”
“सबसे पहले… व्यक्ति को डीमैटेरियलाइज़ किया जाता है।”
“यानी उसके शरीर के ऊर्जा पैटर्न को तोड़ा जाता है।”
“फिर उसे एक बीम की तरह दूसरी जगह भेजा जाता है।”
“और लक्ष्य स्थान पर उसी पैटर्न को दोबारा बनाया जाता है।”
डॉ. क्रूगर ध्यान से सुन रहे थे।
जैक ने आगे कहा…
“मैं मानता हूँ कि फिल्म में इसे बहुत सरल तरीके से दिखाया गया है।”
“लेकिन इसके पीछे एक वैज्ञानिक विचार छिपा हुआ है।”
“और वही विचार मुझे क्वांटम टेलीपोर्टेशन तक लेकर गया।”
जैक अब पूरी तरह अपने विषय में डूब चुका था।
“1993 में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इसी विषय पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।”
“उस रिपोर्ट में क्वांटम अवस्था को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पुनर्निर्मित करने की संभावना पर चर्चा की गई थी।”
“इस प्रक्रिया में दो पक्ष होते हैं।”
“एक… एलिस।”
“और दूसरा… बॉब।”
“उनके पास पहले से एक-दूसरे से जुड़े हुए, यानी EPR-correlated कणों की एक जोड़ी होती है।”
“एलिस एक क्वांटम सिस्टम और अपने कण का संयुक्त मापन करती है।”
“फिर उस मापन की जानकारी बॉब तक पहुँचती है।”
“और बॉब अपने कण की अवस्था को बदलकर उस अज्ञात क्वांटम अवस्था की प्रतिकृति बना सकता है।”
डॉ. क्रूगर कुछ नहीं बोले।
जैक ने महसूस किया कि अब उनकी आँखों में पहले जैसी शंका नहीं थी।
अब वहाँ…
दिलचस्पी थी।
जैक ने धीरे से कहा…
“यही मेरा शुरुआती बिंदु है।”
“मैं फिल्म के विचार को वास्तविक विज्ञान से जोड़ना चाहता हूँ।”
“लेकिन मैं सीधे इंसान से शुरुआत नहीं करूँगा।”
“सबसे पहले… फोटॉन।”
डॉ. क्रूगर ने पूछा...
“फोटॉन?”
“जी।”
“अगर हम फोटॉन को सफलतापूर्वक टेलीपोर्ट कर पाए…”
“तो हम धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं।”
“फिर शायद परमाणुओं तक।”
“और उसके बाद…”
जैक की आवाज़ कुछ पल के लिए रुक गई।
उसने डॉ. क्रूगर की आँखों में देखा।
“शायद बड़ी वस्तुओं तक।”
डॉ. क्रूगर ने पूछा…
“और इंसान?”
जैक ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर बोला...
“एक दिन।”
“लेकिन शुरुआत बहुत छोटी होगी।”
“एक छोटी, निर्जीव और अकार्बनिक वस्तु।”
“उसके बाद…”
“अकशेरुकी जीव।”
“और अगर हर चरण सफल रहा…”
“तो शायद…”
“इंसान।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कुछ सेकंड तक डॉ. क्रूगर जैक को देखते रहे।
फिर अचानक उन्होंने पूछा...
“और इससे पैसा कैसे बनेगा?”
जैक चौंक गया।
इतनी वैज्ञानिक चर्चा के बाद उसने इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी।
लेकिन फिर उसे समझ आया…
यही तो असली दुनिया थी।
अगर उसकी खोज सफल होती…
तो इसका असर सिर्फ़ विज्ञान पर नहीं पड़ता।
इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता।
लॉजिस्टिक्स…
परिवहन…
कार्गो…
शिपिंग…
सब कुछ बदल सकता था।
जैक ने कहा…
“सर… अगर यह सफल हुआ…”
“तो इसे बाजार में उतारा जा सकता है।”
“यह परिवहन और लॉजिस्टिक्स की दुनिया को पूरी तरह बदल देगा।”
डॉ. क्रूगर मुस्कुराए।
पहली बार।
उन्होंने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा…
“बहुत अच्छा।”
उन्होंने जैक की ओर हाथ बढ़ाया।
“तुम HR के पास अपना आवेदन जमा कर सकते हो।”
“और तुम्हें हमारे साथ एक गैर-प्रकटीकरण समझौते पर हस्ताक्षर करना होगा।”
फिर उन्होंने कहा…
“तुम्हारे काम का श्रेय… तुम्हारा होगा।”
जैक ने उनका हाथ थाम लिया।
और उसी क्षण…
उसकी ज़िंदगी बदल गई।
“क्रूगर साइंस लैब्स में तुम्हारा स्वागत है।”
उस दिन जैक सिर्फ़ एक नौकरी लेकर बाहर नहीं निकला था।
वह अपने साथ एक सपना लेकर निकला था।
एक ऐसा सपना…
जिसे दुनिया शायद पागलपन कहती।
लेकिन जैक…
उसे विज्ञान बनाना चाहता था।
और फिर…
साल बीतते गए।
प्रयोग शुरू हुए।
एक के बाद एक।
पहली बार…
फिर दूसरी बार…
फिर तीसरी बार…
और आखिरकार…
जैक एक ऐसी सीमा तक पहुँच गया...
जिसे देखकर उसे लगा कि उसका सपना सच होने वाला है।
उसने फोटॉन को…
एक जगह से दूसरी जगह भेजना शुरू कर दिया था।
लेकिन एक समस्या थी।
वह फोटॉन…
सिर्फ़ 150 किलोमीटर तक पहुँच पाते थे।
उसके बाद…
वे रास्ते में ही गायब हो जाते।
जैक ने हार नहीं मानी।
उसे यकीन था कि गलती उसकी गणनाओं में है।
उसने सब कुछ फिर से जाँचा।
अपने सहयोगियों से भी जाँच करवाया।
छह महीने बाद उसने दोबारा प्रयोग किया।
लेकिन परिणाम वही था।
असफलता।
फिर एक और प्रयास।
फिर असफलता।
और फिर…
एक दिन…
जैक ने ऐसी खबर पढ़ी…
जिसने उसके अंदर की आख़िरी शांति भी छीन ली।
चीन के वैज्ञानिकों ने...
एक फोटॉन को…
पृथ्वी से लगभग 500 किलोमीटर दूर…
एक उपग्रह तक टेलीपोर्ट कर दिया था।
वह प्रयोग सफल हुआ था।
वहाँ…
जहाँ जैक चार साल से असफल हो रहा था।
जैक ने स्क्रीन को घूरते हुए वह खबर पढ़ी।
उसकी मुट्ठियाँ धीरे-धीरे भींच गईं।
उसके अंदर सिर्फ़ एक सवाल गूँज रहा था…
“वे कर सकते हैं…”
“तो मैं क्यों नहीं?”
और उस सवाल के साथ…
जैक ने एक बार फिर अपने आपको काम में झोंक दिया।
लेकिन उसे नहीं पता था…
कि इस बार समस्या सिर्फ़ उसके प्रयोग की नहीं थी।
उसकी दूसरी रिसर्च…
डार्क एनर्जी…
भी उसी रहस्य से जुड़ी हुई थी।
और जब दो असंभव सिद्धांत…
एक-दूसरे से जुड़ जाएँ…
तो कभी-कभी…
उनके बीच छिपा सच…
इंसान की पूरी ज़िंदगी बदल देता है।
जैक को अभी इसका अंदाज़ा नहीं था।
लेकिन उसकी कहानी…
अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी थी…
जहाँ से वापस लौटना…
शायद संभव नहीं था।








