दिसंबर का आख़िरी हफ़्ता।
जर्मनी का शहर बर्लिन क्रिसमस की रोशनी में नहाया हुआ था।
सड़कों पर बर्फ़ गिर रही थी। घरों की छतें सफ़ेद हो चुकी थीं। पेड़ों, दुकानों और कारों पर जमी बर्फ़ ऐसी लग रही थी… जैसे किसी शरारती हलवाई ने पूरे शहर पर चीनी की परत चढ़ा दी हो।
हर तरफ़ क्रिसमस की खुशबू थी।
चीड़ के पेड़ों की महक…
गर्म मुल्ड वाइन…
और ताज़ा बने प्लम केक की मीठी खुशबू।
बाज़ार के बीचोंबीच लगा विशाल क्रिसमस ट्री रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था।
लोग खुश थे।
बच्चे बर्फ़ में खेल रहे थे।
परिवार साथ घूम रहे थे।
जोड़े हाथों में हाथ डाले सड़कों पर चल रहे थे।
कहीं संगीत बज रहा था…
कहीं हँसी सुनाई दे रही थी…
और कहीं लोग आने वाली क्रिसमस की रात के लिए आख़िरी तैयारियाँ कर रहे थे।
पूरा बर्लिन जैसे किसी खूबसूरत सपने में खोया हुआ था।
लेकिन…
इसी शहर में एक ऐसी जगह भी थी जहाँ क्रिसमस का कोई मतलब नहीं था।
वहाँ न संगीत था...
न हँसी…
न परिवार…
सिर्फ़ मशीनों की आवाज़ थी।
और एक आदमी का गुस्सा।
वह आदमी था…
जैक।
अट्ठाईस साल का एक युवा वैज्ञानिक।
वह अपनी लैब में अकेला बैठा था।
उसके सामने कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ आँकड़े थे।
वह उन आँकड़ों को बार-बार देख रहा था।
फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसने गहरी साँस ली।
और गुस्से में बुदबुदाया…
“ये नहीं हो सकता।”
उसने फिर स्क्रीन देखी।
गणनाएँ सही थीं।
उसने सब कुछ दो बार जाँचा था।
फिर भी…
प्रयोग असफल था।
एक बार फिर।
दसवीं बार।
लगातार दसवीं बार।
जैक ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
चार साल।
पूरे चार साल उसने इस प्रोजेक्ट पर लगा दिए थे।
और अब…
उसे लग रहा था कि वह वहीं खड़ा है जहाँ चार साल पहले खड़ा था।
अचानक उसे कुछ याद आया।
उसका लैब असिस्टेंट…
साइमन।
जैक ने तुरंत आवाज़ लगाई।
“साइमन!”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने और ज़ोर से कहा…
“साइमन!”
फिर उसे याद आया।
साइमन आज लैब में नहीं था।
वह अपने परिवार के साथ घर पर था।
आज क्रिसमस था।
जैक कुछ पल के लिए चुप हो गया।
उसे एहसास हुआ कि उसने अपने काम के जुनून में यह बात भी भुला दी थी।
लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र फिर उन असफल परिणामों पर चली गई।
उसे उन आँकड़ों की ज़रूरत थी।
उसने साइमन को फोन मिला दिया।
पहली बार…
कोई जवाब नहीं।
दूसरी बार…
फिर कोई जवाब नहीं।
तीसरी बार फोन उठा।
पृष्ठभूमि में शोर था।
लोगों की आवाज़ें…
हँसी…
संगीत…
साइमन किसी क्रिसमस पार्टी में था।
“क्या हुआ, जैक?”
उसकी आवाज़ में घबराहट थी।
क्योंकि साइमन जानता था…
जैक बिना किसी गंभीर वजह के कभी फोन नहीं करता।
जैक ने सीधे पूछा...
जैक ने सीधे पूछा…
“क्या तुमने उन आँकड़ों को दोबारा कैलिब्रेट किया था?”
कुछ पल की चुप्पी।
फिर साइमन ने कहा…
“हाँ।”
“तो परिणाम कहाँ हैं?”
“जैक…”
साइमन की आवाज़ धीमी हो गई।
“परिणाम वही हैं।”
जैक की आँखों में गुस्सा आ गया।
“मतलब?”
“मतलब… हमारी गणनाएँ सही हैं।”
“और?”
“और प्रयोग काम नहीं करेगा।”
जैक कुछ नहीं बोला।
दूसरी तरफ़ से पार्टी का शोर अब भी सुनाई दे रहा था।
साइमन ने धीरे से कहा...
“मैंने इसे दो बार चेक किया है। हर बार वही परिणाम आया।”
फिर कुछ हिचकिचाने के बाद उसने कहा…
“शायद हमें इस प्रोजेक्ट को छोड़कर किसी और प्रोजेक्ट पर काम करना चाहिए।”
बस…
इतनी सी बात।
लेकिन जैक के लिए यह सुनना आसान नहीं था।
किसी और के लिए चार साल सिर्फ़ चार साल हो सकते थे।
लेकिन जैक के लिए…
ये उसकी ज़िंदगी थी।
उसने अपनी नींद खोई थी।
अपना स्वास्थ्य खोया था।
अपने रिश्ते खोए थे।
और सबसे बड़ी बात…
उसने अपना विश्वास इस प्रोजेक्ट में लगा दिया था।
वह इसे कैसे छोड़ सकता था?
जैक ने ठंडी आवाज़ में कहा…
“भूल जाओ।”
फिर कुछ पल रुका।
और बोला…
“हैप्पी हॉलीडेज़।”
फोन कट गया।
लैब में फिर वही सन्नाटा छा गया।
जैक धीरे-धीरे अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
उसने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया।
पहली बार उसे महसूस हुआ…
कि शायद साइमन सही कह रहा था।
शायद उसे रुक जाना चाहिए।
शायद उसे कुछ समय के लिए इस सब से दूर हो जाना चाहिए।
लेकिन एक सवाल उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था…
आख़िर वह असफल क्यों हो रहा था?
उसका सिद्धांत सही था।
उसकी गणनाएँ सही थीं।
फिर भी…
कुछ ऐसा था जो उसकी समझ से बाहर था।
और यही चीज़ उसे अंदर से तोड़ रही थी।
जैक ने कमरे के बाहर देखा।
खिड़की के उस पार बर्फ़ गिर रही थी।
दूर कहीं क्रिसमस का संगीत बज रहा था।
लोग अपने परिवारों के साथ थे।
और वह…
अपनी लैब में अकेला था।
तभी उसकी नज़र कूड़ेदान पर पड़ी।
उसमें कैंडी के खाली रैपर भरे थे।
और उसके दोपहर के खाने के बचे हुए हिस्से भी।
दो चीज़बर्गर…
फ्राइज़…
और कोक।
जैक कुछ पल उन्हें देखता रहा।
फिर उसके मन में एक अजीब सा सवाल आया।
आख़िरी बार उसने स्वस्थ खाना कब खाया था?
उसे याद नहीं आया।
आख़िरी बार वह किसी रेस्तराँ में कब गया था?
यह भी याद नहीं आया।
कभी वह खाने का बहुत शौकीन था।
नई-नई जगहों पर जाना…
अलग-अलग व्यंजन आज़माना…
दोस्तों के साथ समय बिताना…
उसे सब पसंद था।
लेकिन अब?
अब उसकी पूरी दुनिया सिर्फ़ एक चीज़ थी।
उसका प्रोजेक्ट।
टेलीपोर्टेशन।
एक ऐसा सपना…
जिसे पूरी दुनिया विज्ञान-कथा मानती थी।
लेकिन जैक उसे हकीकत बनाना चाहता था।
वह इंसानों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना चाहता था…
बिना किसी रास्ते के।
बिना किसी ट्रेन के।
बिना किसी विमान के।
सिर्फ़ कुछ सेकंड में।
वह मानता था कि यह संभव है।
लेकिन पिछले चार सालों ने उसे एक ही जवाब दिया था…
नहीं।
जैक अचानक अपनी कुर्सी से उठा।
उसने कंप्यूटर बंद किया।
सारे कागज़ इकट्ठे किए।
कुछ पल तक उन्हें देखा।
फिर…
एक-एक करके उन्हें कूड़ेदान में फेंकना शुरू कर दिया।
उसके प्रोजेक्ट से जुड़ी हर चीज़…
कूड़ेदान में जा रही थी।
कुछ कागज़ श्रेडर में चले गए।
कुछ फाड़ दिए गए।
और कुछ…
जैक ने बस छोड़ दिए।
वह बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा।
बाहर बर्फ़ लगातार गिरती रही।
और अंदर...
एक वैज्ञानिक अपने चार साल के सपने को खत्म करने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन शायद…
कहानी यहीं खत्म नहीं होने वाली थी।
क्योंकि जैक का असली सफ़र…
अभी शुरू भी नहीं हुआ था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले समय में…
उसकी ज़िंदगी उसे ऐसी जगह ले जाने वाली है…
जहाँ विज्ञान...
कल्पना…
और किस्मत…
तीनों एक-दूसरे से टकराने वाले थे।
और इस सबकी शुरुआत…
कई साल पहले हुई थी।
उस दिन…
जब एक युवा वैज्ञानिक ने पहली बार एक ऐसी मशीन का सपना देखा था…
जो इंसान को एक जगह से दूसरी जगह…
पलक झपकते ही पहुँचा सकती थी।
और उस सपने के पीछे छिपी कहानी…
अब शुरू होने वाली थी।








