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नौकरी गई… अब क्या?”

नौकरी गई… अब क्या?”

क्या आपने कभी सुबह उठकर महसूस किया है…

कि आपकी पूरी दुनिया एक रात में बदल चुकी है?

न ऑफिस जाना है…

न किसी मीटिंग की चिंता…

न किसी डेडलाइन का दबाव…

सुनने में अच्छा लगता है…

लेकिन अगर यह सब इसलिए हो…

क्योंकि आपने अपनी नौकरी खो दी है…

तो?

जैक की आंख अचानक खुली।

कमरे में अभी भी अंधेरा था।

खिड़की के बाहर बर्फ जमी हुई थी।

उसका हाथ आदतन अलार्म घड़ी की ओर बढ़ा।

उसने अलार्म बंद किया।

और बिस्तर से उठने ही वाला था…

कि अचानक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी।

वह वहीं रुक गया।

कुछ सेकंड तक उसकी सांसें थम गईं।

फिर वह धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठ गया।

कल रात…

उसने नौकरी छोड़ दी थी।

यह कोई सपना नहीं था।

यह सच था।

वह बेरोजगार हो चुका था।

जैक ने खुद को चुटकी काटी।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

दर्द हुआ।

मतलब…

यह सच था।

दस साल में पहली बार…

सुबह के छह बजे थे…

और उसके पास कहीं जाने की कोई वजह नहीं थी।

अचानक उसके पेट ने जोर से आवाज की।

भूख।

कम से कम एक चीज अभी भी पहले जैसी थी।

जैक रसोई की ओर बढ़ा।

उसने दूध निकाला।

सीरियल निकालने वाला था…

लेकिन फिर रुक गया।

आज उसे जल्दी नहीं थी।

आज कोई लैब नहीं थी।

कोई प्रयोग नहीं था।

कोई बॉस नहीं था।

तो क्यों न एक शानदार नाश्ता किया जाए?

कुछ देर बाद...

रसोई में पैनकेक की खुशबू फैल चुकी थी।

अंडे।

मैदा।

ब्लूबेरी।

और ऊपर से बटरस्कॉच सॉस।

कुछ ही मिनटों में…

जैक के सामने सुनहरे पैनकेक का ढेर लगा था।

और वह उन्हें ऐसे खा रहा था…

जैसे वर्षों से भूखा हो।

खाते-खाते…

उसे अपना बचपन याद आ गया।

जब हर रविवार उसकी मां केक बनाती थीं।

जब वह चॉकलेट के लिए पागल था।

जब दुनिया की सबसे बड़ी खुशी…

अच्छा खाना हुआ करती थी।

लेकिन…

खुशियों के साथ अक्सर अपराधबोध भी आता है।

उसने नीचे अपने पेट की ओर देखा।

140 किलो।

उसे डॉक्टर की बातें याद आ गईं।

ब्लड प्रेशर।

कोलेस्ट्रॉल।

मोटापा।

और असफलता।

फिर उसके दिमाग में एक और विचार आया।

“मैंने आखिर नौकरी छोड़ कैसे दी?”

कल रात जो हिम्मत दिखाई थी…

वह आज गायब थी।

अब सिर्फ डर बचा था।

क्या होगा?

लोग क्या सोचेंगे?

डॉ. क्रूगर क्या सोचेंगे?

साइमन क्या सोचेगा?

घबराहट बढ़ने लगी।

वह कमरे में चक्कर काटने लगा।

उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।

उसे लग रहा था जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो।

और फिर…

उसने एक और पैनकेक खा लिया।

फिर दूसरा।

फिर बटरस्कॉच की पूरी बोतल मुंह से लगा ली।

कुछ सेकंड बाद…

वह खांस रहा था।

लगभग दम घुट गया था।

“बहुत बढ़िया जैक…”

उसने खुद से कहा।

“जिंदगी पहले ही बर्बाद है…

अब खुद को भी खत्म कर लो।”

कुछ देर बाद…

उसने फोन उठाया।

सबसे पहले साइमन को कॉल किया।

कॉल पहली घंटी में उठ गई।

जैसे वह इंतजार कर रहा हो।

“जैक…

क्या यह सच है?”

साइमन की आवाज धीमी थी।

जैक हंसा।

कम से कम कोशिश की।

“हाँ दोस्त…

आखिरकार तुम मुझसे आजाद हो गए।”

कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे।

फिर जैक बोला—

“मैं टूट रहा था साइमन…

मुझे रुकना पड़ता…

वरना मैं पूरी तरह खत्म हो जाता।”

दूसरी तरफ फिर खामोशी थी।

फिर साइमन बोला—

“अपना ख्याल रखना।”

और उसने फोन काट दिया।

उसके बाद जैक ने अपने बॉस…

डॉ. क्रूगर को फोन किया।

उसे उम्मीद थी कि वे गुस्सा होंगे।

चिल्लाएंगे।

उसे गैर-जिम्मेदार कहेंगे।

लेकिन जो हुआ…

उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

डॉ. क्रूगर ने सिर्फ एक सवाल पूछा।

“तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

जैक चुप हो गया।

क्योंकि उसके पास कोई जवाब नहीं था।

फिर डॉ. क्रूगर ने कहा—

“तुम सबसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हो…

जिसे मैंने कभी नियुक्त किया है।

लेकिन प्रतिभा का क्या फायदा…

अगर इंसान अंदर से टूट चुका हो?”

ये शब्द…

जैक के दिल में उतर गए।

पहली बार…

किसी ने उसकी असफलता नहीं देखी।

किसी ने उसका दर्द देखा।

फोन कट गया।

घर फिर से शांत हो गया।

बहुत शांत।

इतना शांत…

कि जैक को अपने ही विचारों की आवाज सुनाई देने लगी।

उसे नहीं पता था…

कि कुछ ही घंटों बाद…

एक बर्फीले पार्क में…

उसकी मुलाकात ऐसे दोस्त से होने वाली है…

जो उसकी जिंदगी की दिशा बदल देगा।

लेकिन वह दोस्त इंसान नहीं होगा।

वह होगा…

एक छोटा सा पिल्ला।

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