चार साल…
चार साल उसने अपनी पूरी ज़िंदगी…
एक ऐसे सपने के पीछे लगा दी थी,
जिसका कोई अंत उसे दिखाई नहीं दे रहा था।
टेलीपोर्टेशन…
जिसे कभी उसने इंसानियत का भविष्य समझा था,
आज वही सपना…
उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार बन चुका था।
लेकिन असली कीमत…
सिर्फ उसके प्रोजेक्ट ने नहीं चुकाई थी।
उसने खोया था…
अपना रिश्ता।
अपनी सेहत।
अपनी मानसिक शांति।
और शायद…
अपने आप को भी।
जैक को सामंथा याद आई।
वही सामंथा…
जिससे उसने सगाई की थी।
लेकिन सगाई के कुछ ही दिनों बाद...
वह उसे छोड़कर चली गई थी।
उसके शब्द आज भी जैक के कानों में गूंज रहे थे।
**“मान लो, जैक…”**
**“हमारा रिश्ता तुम्हारी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।”**
**“मैं तुम्हें अपने काम में डूबते हुए देखती हूँ…”**
**“और मुझे इससे ज्यादा चाहिए।”**
जैक ने तब भी...
उसे रोकने की कोशिश नहीं की थी।
शायद…
कहीं न कहीं वह जानता था…
कि सामंथा सही थी।
वह कभी अपने काम से छुट्टी नहीं ले सकता था।
और अगर वह उससे शादी कर लेती…
तो शायद…
वह पूरी ज़िंदगी एक ऐसे आदमी के साथ फँसी रहती…
जिसके लिए काम हमेशा सबसे पहले आता।
इसलिए जैक ने खुद को समझा लिया था...
कि जो हुआ…
शायद अच्छे के लिए ही हुआ।
लेकिन आज…
उसे पहली बार महसूस हुआ…
कि सामंथा को खोने के साथ…
उसने अपनी ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी खो दिया था।
और फिर…
उसे अपनी सेहत का ख्याल आया।
आज सुबह आईने में खुद को देखकर...
वह खुद को पहचान तक नहीं पाया था।
कभी वह फिट और एथलेटिक हुआ करता था।
भूरे बाल।
हरी आँखें।
मज़बूत जबड़ा।
और एक ऐसा शरीर…
जिस पर कॉलेज में लड़कियाँ तक मोहित हो जाती थीं।
लेकिन अब...
लैब में बंद रहकर…
लगातार जंक फूड खाते हुए…
उसका शरीर पूरी तरह बदल चुका था।
उसका वजन…
**एक सौ चालीस किलो।**
आँखों के नीचे काले घेरे।
हाई ब्लड प्रेशर।
हाइपरटेंशन।
और बढ़ता हुआ कोलेस्ट्रॉल।
डॉक्टर उसे चेतावनी दे चुके थे।
उसे अपना वजन…
बहत्तर किलो तक लाना था।
सख्त डाइट अपनानी थी।
व्यायाम करना था।
लेकिन जैक ने…
कुछ नहीं किया।
काम…
हमेशा काम।
और अब…
उसे अपनी लापरवाही का परिणाम साफ दिखाई दे रहा था।
वह कुर्सी पर बैठा रहा।
उसके मन में एक सवाल घूम रहा था।
**“मैं चार साल से अपना सिर इस दीवार से टकरा रहा हूँ…”**
**“और आज भी उतना ही अनजान हूँ, जितना शुरुआत में था।”**
लैब ने उस पर इतना भरोसा किया था।
इतना पैसा लगाया था।
इतना समर्थन दिया था।
और बदले में…
उसके पास देने के लिए कुछ नहीं था।
उसे डर लग रहा था।
डॉ. क्रूगर का सामना कैसे करेगा?
और उसके माता-पिता?
जिनसे वह एक साल से मिला तक नहीं था।
वह उनसे इतना दूर क्यों हो गया था?
इन सवालों ने...
उसके भीतर कुछ बदल दिया।
जैक समझ गया…
कि अगर वह इसी तरह चलता रहा…
तो यह असफलता उसे पूरी तरह तोड़ देगी।
उसे रुकना होगा।
उसे पीछे हटना होगा।
और शायद...
खुद को दोबारा खड़ा करना होगा।
उसने आखिरकार फैसला कर लिया।
**वह एक ब्रेक लेगा।**
एक लंबी छुट्टी।
एक…
**सैबेटिकल।**
कम से कम एक साल के लिए।
वह अपनी ज़िंदगी को फिर से व्यवस्थित करेगा।
अपनी सेहत सुधारेगा।
अपने रिश्तों को समझेगा।
और फिर…
एक दिन…
नई आँखों से उस समस्या को दोबारा देखेगा।
जैक ने अपने कंधे सीधे किए।
लैपटॉप खोला।
और ईमेल लिखना शुरू किया।
उसके शब्दों में…
चार साल की मेहनत थी।
चार साल की थकान थी।
और…
एक वैज्ञानिक की ईमानदारी।
उसने स्वीकार किया कि वह एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुका है…
जहाँ न वह पीछे लौट सकता है...
और न ही आगे बढ़ सकता है।
उसने लिखा…
कि उसने अपनी ज़िंदगी के चार साल इस प्रोजेक्ट को दिए हैं।
लेकिन इस समय…
वह पूरी तरह एक डेड एंड पर पहुँच चुका है।
उसे मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को फिर से तैयार करना होगा।
उसने माफी माँगी।
उसने लिखा कि उसने बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी सफलता का वादा किया था…
लेकिन वह उसे पूरा नहीं कर पाया।
और फिर…
उसने आखिरी फैसला लिख दिया।
**वह कम से कम एक साल के लिए सैबेटिकल ले रहा था।**
अब यह लैब पर निर्भर था...
कि वे उसे अपने साथ रखना चाहते हैं…
या उससे अलग होना चाहते हैं।
ईमेल पूरा हुआ।
जैक ने उसे एक बार पढ़ा।
फिर…
उसने बिना दोबारा सोचे…
**Send** दबा दिया।
ईमेल चला गया।
और उसी पल…
जैसे उसके कंधों से कोई बहुत बड़ा बोझ उतर गया।
वह उठा।
अपना लैब कोट उतारा।
उसे दरवाज़े के पीछे टाँग दिया।
बस।
अब यहाँ उसका कुछ नहीं था।
उसका फोन भी कंपनी का था।
लैपटॉप भी कंपनी का था।
वह कुछ लेकर नहीं जा रहा था।
जैक ने आखिरी बार अपनी लैब को देखा।
वही कमरा…
जहाँ उसने चार साल बिताए थे।
वही मशीनें।
वही उपकरण।
वही स्क्रीन।
वही अधूरा सपना।
उसने एक गहरी साँस ली।
और दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।
फिर…
वह बाहर निकल आया।
बर्लिन की ठंडी रात उसका इंतज़ार कर रही थी।
चारों तरफ बर्फ थी।
क्रिसमस की रात थी।
शहर…
एक खूबसूरत सफेद चादर में लिपटा हुआ था।
जैक ने टैक्सी बुलाने के लिए फोन निकालना चाहा…
लेकिन तभी…
दूर से चर्च की घंटियों की आवाज़ सुनाई दी।
**टन… टन… टन…**
वह कुछ पल के लिए वहीं रुक गया।
लैब के अंदर की खामोशी…
और बाहर की दुनिया…
एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं।
लैब में…
जैसे समय रुक गया था।
लेकिन बाहर...
दुनिया चल रही थी।
लोग अपने परिवारों के साथ थे।
शहर अपनी रफ्तार से जी रहा था।
और जैक ने मन ही मन सोचा…
**“दुनिया मेरे बिना भी चलती रही…”**
फिर उसने खुद से कहा…
**“कोई बात नहीं।”**
**“मैं भी वापस उस दुनिया का हिस्सा बनूँगा।”**
उसे नहीं पता था…
कि ज़िंदगी अब उसे कहाँ लेकर जाएगी।
उसे नहीं पता था…
कि उसका सपना फिर कभी पूरा होगा या नहीं।
उसे यह भी नहीं पता था…
कि अगले कुछ महीनों में उसके साथ क्या होने वाला है।
लेकिन…
बहुत लंबे समय के बाद…
उसके अंदर कुछ महसूस हो रहा था।
**उम्मीद।**
जैक ने गहरी साँस ली।
ठंडी हवा उसके फेफड़ों में भर गई।
उसने आसमान की तरफ देखा।
फिर…
धीरे-धीरे…
घर की ओर चल पड़ा।
उस रात…
जैक ने सिर्फ एक लैब नहीं छोड़ी थी।
उसने अपनी पुरानी ज़िंदगी पीछे छोड़ दी थी।
और उसके सामने…
एक खाली रास्ता था।
एक ऐसा रास्ता…
जिसकी कोई मंज़िल दिखाई नहीं दे रही थी।
लेकिन शायद…
हर नई शुरुआत से पहले…
रास्ता ऐसा ही दिखाई देता है।
अंधेरा…
खामोश…
और अनजान।
जैक के कदम धीरे-धीरे बर्फ पर आगे बढ़ते रहे।
और उसके दिल में…
कई सालों बाद...
एक छोटी-सी उम्मीद जन्म ले चुकी थी।
**शायद सब कुछ खत्म नहीं हुआ था।**
**शायद…**
**ज़िंदगी के पास उसके लिए अभी कुछ बाकी था।**
और इसी उम्मीद के साथ…
जैक उस रात…
अपने घर की ओर चलता चला गया।








